सीजी टूडे 24 ब्यूरो रिपोर्ट राजीव कश्यप
रामानुजगंज विधायक द्वारा बैंक कर्मियों को थप्पड़ मारने के बाद दूसरे दिन मारने का कोई अफसोस नहीं है जैसा बयान जारी कर फिर बाद में अंततः मिठाई खिलाकर समझौता कर लेना एक नाटकीय पूर्ण घटना का हालांकि पटाक्षेप तो हो गया किंतु छत्तीसगढ़ जैसे शांत फिजा वाले राज्य में कैसी अशांत की बयार बहेगी शायद इसका कोई आकलन करना भी मुनासिब नहीं समझ रहा है हमारे सरगुजा में एक कहावत है कि पहले मारो ला त फिर खिलाओ भात उस कहावत को यह घटनाक्रम चरितार्थ करता नजर आ रहा है या यूं कहा जाए कि छत्तीसगढ़ की राजनीति में अब एक नई परिपाटी की शुरुआत हो गई है विधायक रामानुजगंज बृहस्पति सिंह द्वारा बैंक कर्मचारियों को थप्पड़ मारने का मामला पूरे छत्तीसगढ़ में गर्म था लेकिन कल उन्होंने बैंक कर्मियों को मिठाई खिलाकर समझौता कर लिया इससे अब समाज में क्या संदेश जाएगा इसका आप आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं कई बुद्धिजीवी वर्गों का कहना है कि इस नई परिपाटी की शुरुआत से अब आए दिन प्रभावशाली और दबंग लोग शासन के तले दबे अधिकारी कर्मचारियों को इसी तरह थप्पड़ मारेंगे और बाद में मिठाई खिलाकर समझौता भी कर लेंगे इस घटनाक्रम से मौजूदा हालात में समाज पर विपरीत व एक गलत धारणा स्वयंमेव परिलक्षित हो रही है अब विधायक किसी किशान को प्रताड़ित करने से लेकर खुलेआम सहकारी बैंक कर्मचारियों पर अवैध रूप से शासकीय राशि का भ्रष्टाचारी के वजह से या फिर आवेश में आकर ऐसा घटना को अंजाम देने की बात कर रहे हैं लेकिन उनका यह बयान आम जनताओं के गले के नीचे नहीं उतर रही है और उतरे भी कैसे सरकार में रहते हैं एक जिम्मेदार व्यक्ति जब इस तरह विरोधाभासी बयान जारी करें तो लाजमी है कि इस पर सवाल तो उठनी ही चाहिए खैर इस तरह के बयानों को लेकर बृहस्पति जी आए दिन सुर्ख़ियों में रहते हैं और टीआरपी पाने के लिए बगैर तर्कसंगत न्याय संगत बातों को दरकिनार करते रहते हैं पर वह भूल जाते हैं की उनकी इस इससे समाज को क्या संदेश जाएगा हम आपको बताते चलें की इस घटना के बाद समाज वह ऐसे दबंग तथा प्रभावशाली व्यक्तियों के हौसले अब और बढ़ गए हैं तथा निचले तबके एवं कथित तौर पर शासन के अधीन रह कर कार्य करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों कर्मचारियों के लिए आगामी भविष्य को लेकर असुरक्षा की भावना बढ गई है वहीं एक सभ्य समाज के लिए यह तथ्य व कृत्य केवल असामाजिक गतिविधियों को बढ़ाने वाला ही माना जा सकता है बहरहाल जो भी हो इस घटना पर सरकार के मुखिया भूपेश बघेल और सत्तारूढ़ पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम जी की चुप्पी ने अपराधिक प्रवृत्ति के माहौल को और बढ़ावा देने का काम किया है चुकी चुनावी वर्ष से इस दृष्टिकोण से संगठन एवं सरकार को महज दिखावे के लिए ही सही पर कोई न कोई कार्यवाही करने की आवश्यकता थी भले ही वह केवल खानापूर्ति के लिए ही क्यों ना हो कम से कम सभ्य समाज में असभ्य संस्कृति तो नहीं फैलती इस पर ना संगठन ने विधायक से कोई जवाब मांगा और ना ही सरकार के मुख्यमंत्री ने कुछ कहने की जहमत उठाई बहरहाल नौटंकीपुर्ण इस थप्पड़ कांड ने लोगों की धारणा वह मानसिकता जरूर बदल कर रख दी है इस आलेख को हम किसी पार्टी या व्यक्ति विशेष को लेकर नहीं लिख रहे हैं लेकिन यह लिखने की आवश्यकता इसलिए इसलिए प्रकट हो रही है कि जिले से लेकर प्रदेश के शासन व प्रशासन के मुखिया सहित कई राजनैतिक दल प्रमुख विपक्ष के नेतागण तथा विभिन्न समाजसेवी संगठनों व मानव अधिकारों की रक्षा करने वाले तथा मानव अधिकार परिषद के पदाधिकारियों को आईना दिखाना है जो निम्न मध्यम तथा पहुंच ना रखने वाले लोगों पर द्वारा इस प्रकार की घटना की जाती है तो घटना को लेकर हड़ताल चक्का जाम ज्ञापन सौंपने जैसे कार्य आए दिन करते हुए खूब वाहवाही लूट अपनी अपनी रोटी सेकने वाले तथाकथित लोगों को ध्यान आकृष्ट करा पायें ताकि वे अपनी कार्यों की निष्पक्षता का प्रमाण पेस कर सकें और समाज में फैल रही इस विकृत संदेश को रोकने कम से कम एक कदम तो आगे बड़ा सके नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब अपने आप को नेता मंत्रियों के पहुंच बताने वाले छुट भैया नेता सरकारी ऑफिसों में घुसकर उन्हें थप्पड़ व लात मारेंगे जैसा कि कुछ दिन पूर्व ही अंबिकापुर के गांधीनगर थाने में घटना हुई थी उसकी पुनः पुनरावृति ना हो सके हम तमाम उन समाजसेवी संस्थाओं व मानव हित के लिए लड़ने वाले एनजीओ से अपील करते हैं कि मामले की गहराई को समझते हुए अपनी अपने चुप्पी तोड़ केवल बयान बाजी तक ही सीमित ना रहे बल्कि लोकतंत्र प्रणाली के लिए खतरा साबित हो रहे इस तरह के कृत्य को रोकने की लिए ठोस कदम उठावेंहमारा प्रमुख मुद्दा यह है कि लोकतंत्र से निर्वाचित होकर एक बड़े राजनीतिक संगठन से जुड़े तथा शासन का एक गरिमामई पद वाले व्यक्ति इस तरह के बचकाना हरकत कर बकायदा बयान जारी करते हुए अफसोस तक ना जताना और बाद में मिठाई खिलाकर समझौता करा देना न्याय प्रणाली तथा लोकतंत्र में जनता का विश्वास अविश्वसनीय तथा अपने आप में ही यह एक यक्ष प्रश्न है!
उक्त आलेख किसी भी तरह से
व्यक्तिगत आक्षेप या पार्टी विशेष को लेकर नहीं लिखी गई है बल्कि सामाजिक हितार्थ अपने स्वविवेक का प्रयोग किया गया है
