Current Date:02 Jun 2026





*छत्तीसगढ़ में 27% ओबीसी आरक्षण लागू करने की मांग:

इस आयोजन ने संगठन की एकजुटता और सामाजिक मुद्दों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाया।

*छत्तीसगढ़ में 27% ओबीसी आरक्षण लागू करने की मांग:
अंबिकापुर - 
सीजी टुडे  24 राजीव कश्यप

छत्तीसगढ़ में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समुदाय के लिए 27% आरक्षण लागू करने की मांग लंबे समय से जोर पकड़ रही है। यह मुद्दा न केवल सामाजिक और शैक्षिक समानता से जुड़ा है, बल्कि यह राज्य के बहुसंख्यक ओबीसी समुदाय के समग्र विकास और उत्थान का भी सवाल है। ओबीसी महासभा इस मांग को लेकर लगातार सक्रिय है और इस दिशा में ठोस कदम उठाने के लिए शासन-प्रशासन से अनुरोध कर रही है।

पृष्ठभूमि और मांग का आधार

भारत के संवैधानिक ढांचे के तहत सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े समुदायों को अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। केंद्र सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1990 के दशक में ओबीसी के लिए 27% आरक्षण लागू किया था। इसके विपरीत, छत्तीसगढ़ में, जो पहले अविभाजित मध्य प्रदेश का हिस्सा था, ओबीसी समुदाय को केवल 14% आरक्षण दिया गया है, जो उनकी जनसंख्या के अनुपात में काफी कम है।
सूत्रों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में ओबीसी समुदाय की आबादी लगभग 45-52% है, फिर भी उन्हें शिक्षा और रोजगार में पर्याप्त हिस्सेदारी नहीं मिल रही है। इससे समुदाय के समुचित विकास में बाधा उत्पन्न हो रही है, जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक और आर्थिक असमानता बढ़ रही है।
आरक्षण संशोधन विधेयक 2022
इस मुद्दे को संबोधित करने के लिए, छत्तीसगढ़ विधानसभा ने 2 दिसंबर 2022 को एक महत्वपूर्ण आरक्षण संशोधन विधेयक पारित किया था। इस विधेयक में अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए 32%, अनुसूचित जाति (एससी) के लिए 13%, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27%, और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए 4% आरक्षण का प्रावधान किया गया है। यह विधेयक राज्यपाल के पास हस्ताक्षर के लिए भेजा गया था, लेकिन अभी तक इस पर अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।
ओबीसी महासभा का प्रयास और आंदोलन की चेतावनी
ओबीसी महासभा ने इस मुद्दे को बार-बार शासन के समक्ष उठाया है। पिछले कई वर्षों से राज्य के सभी जिलों में कलेक्टर, एसडीएम और तहसीलदारों के माध्यम से ज्ञापन सौंपे जा रहे हैं। इसके बावजूद, शासन-प्रशासन द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाने से ओबीसी समुदाय में असंतोष बढ़ रहा है। महासभा ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं की गई, तो वे बड़े पैमाने पर आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे, जिसकी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।
कानूनी और राजनीतिक चुनौतियां
हालांकि, इस मुद्दे को लागू करने में कई कानूनी और प्रशासनिक चुनौतियां सामने आई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के इंद्रा साहनी मामले में आरक्षण की अधिकतम सीमा 50% निर्धारित की थी। छत्तीसगढ़ में प्रस्तावित 76% आरक्षण इस सीमा को पार करता है, जिसके कारण इसे लागू करने में कानूनी अड़चनें आ रही हैं। 2019 में, जब ओबीसी आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% करने का प्रयास किया गया था, तब छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया था। बाद में, सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में 58% आरक्षण (32% एसटी, 12% एससी, और 14% ओबीसी) को अंतरिम रूप से लागू करने की अनुमति दी थी। 
वर्तमान में, ओबीसी समुदाय 27% आरक्षण की मांग को लेकर दबाव बना रहा है। कुछ एक्स पोस्ट्स में यह भी आरोप लगाया गया है कि बीजेपी सरकार और राज्यपाल द्वारा इस विधेयक को जानबूझकर लटकाया जा रहा है, जिससे सामाजिक न्याय की प्रक्रिया में देरी हो रही है।
सामाजिक न्याय की दिशा में एक अवसर
27% ओबीसी आरक्षण लागू करना न केवल सामाजिक समानता को बढ़ावा देगा, बल्कि यह छत्तीसगढ़ के बहुसंख्यक समुदाय को शिक्षा और रोजगार में उनकी जनसंख्या के अनुरूप उचित प्रतिनिधित्व भी प्रदान करेगा। यह कदम स्थानीय शासन में ओबीसी समुदाय की भागीदारी को बढ़ाने और उनके नेतृत्व कौशल को विकसित करने में भी मदद करेगा।
ज्ञापन सौंपने के दौरान प्रदेश उपाध्यक्ष एवं सरगुजा संभाग प्रभारी श्री परशुराम सोनी प्रदेश सचिव श्री सुभाष साहू, संभागीय मीडिया प्रभारी श्री आदित्य गुप्ता, प्रमुख सलाहकार श्री सतनारायण वर्मा, जिला महामंत्री श्री संतोष विश्वकर्मा, जिला कोषाध्यक्ष श्री रघुनंदन सोनी, ब्लॉक मंत्री श्री युगल किशोर वर्मा और श्री प्रकाश दास, साथ ही श्री अविनाश राजवाड़े सहित अन्य पदाधिकारी मौजूद थे। इस आयोजन ने संगठन की एकजुटता और सामाजिक मुद्दों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाया।